कानपुर में प्रशासन की रेड से सिंडिकेट हुआ बेनकाब मगर गाजियाबाद में दलाल बने हुए है सिस्टम का हिस्सा, आरटीओ कार्यालय में बिना 'सुविधा शुल्क' के अटकती हैं फाइलें: सूत्र
सुमित शर्मा---------------
गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश सरकार का 'डिजिटल यूपी' और आरटीओ की 'फेसलेस' सेवाओं का दावा गाजियाबाद के संभागीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ विभाग) की चौखट पर दम तोड़ रहा है। आम जनता को दफ्तरों की धक्का-मुक्की और दलाली प्रथा से निजात दिलाने के लिए शुरू की गई ऑनलाइन व्यवस्था गाजियाबाद के आरटीओ विभाग में आवेदकों के लिए उतनी सहूलियत भरी साबित नहीं हो रही, जितनी होनी चाहिए थी। अब भी अधिकतर काम मैनुअली ही हो रहा है। ग्राउंड रियलिटी यह है कि बिना दलाल का 'चेहरा' देखे अधिकारियों की कलम आगे नहीं बढ़ती। दलालों पर एक्शन लेने के दावे तो बहुत किए जाते हैं लेकिन विभाग में तैनात कुछ अधिकारी दलालों पर ही निर्भर है या यूं कहें कि गाजियाबाद में दलाल अब भी आरटीओ का हिस्सा बने हुए है और इसमें कुछ अधिकारियों कर्मचारियों की हिस्सेदारी की भी चर्चा है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग ने जनता को बड़ी राहत देते हुए फेसलेस व्यवस्था के तहत 39 ऑनलाइन सेवाओं को ऑटो अप्रूवल सिस्टम से जोड़ा है जिससे लोगों को विभाग और दलालों के चक्कर ना लगाने पड़ें और उनका कार्य ऑनलाइन ही हो सकें। दावा किया गया था कि आवेदकों को ड्राइविंग लाइसेंस या वाहन संबंधी कामों के लिए आरटीओ कार्यालय के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। आधार सत्यापन होते ही आवेदन अपने आप अप्रूव हो जाएंगे और यह सभी सेवाएं अब घर बैठे ऑनलाइन मिलेंगी। आरटीओ विभाग की फेसलेस सेवाओं के बारे में प्रदेश के परिवहन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दयाशंकर सिंह ने कहा था कि इस व्यवस्था से सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी, मानवीय हस्तक्षेप कम होगा। इस पहल से समय की भी बचत होगी और डिजिटल गवर्नेंस को नई मजबूती मिलेगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार की मंशा जनता को सहूलियत देने की रही है मगर सरकार और विभाग की इस मंशा पर जिला स्तर पर आरटीओ विभाग में तैनात कुछ अफसर और दलालों की वजह से ही पानी फिर रहा है।
कानपुर में प्रशासन की रेड से उजागर हुआ था आरटीओ कर्मियों-दलालों के गठबंधन का स्याह सच: अभी चंद रोज पहले ही बीती 24 अगस्त 2026 को कानपुर के आरटीओ कार्यालय में चालान की पूरी रकम ऐंठकर आधी-अधूरी रसीद देने और दलालों के बिना काम न होने की शिकायत पर प्रशासन ने पूरे परिसर को घेरकर ड्रोन की निगरानी में रेड मारी थी। एसडीएम व पुलिस बल द्वारा करीब तीन घंटे की छापामार कार्रवाई में पकड़े गए 22 कथित दलालों को काकादेव थाना पुलिस के हवाले किया गया था। साथ ही नकदी में गड़बड़ी मिलने पर सीनियर क्लर्क समेत 15 अधिकारियों-बाबुओं और बिचौलियों पर एफआईआर भी दर्ज की गई।
कानपुर में प्रशासन की रेड से उजागर हुआ था आरटीओ कर्मियों-दलालों के गठबंधन का स्याह सच: अभी चंद रोज पहले ही बीती 24 अगस्त 2026 को कानपुर के आरटीओ कार्यालय में चालान की पूरी रकम ऐंठकर आधी-अधूरी रसीद देने और दलालों के बिना काम न होने की शिकायत पर प्रशासन ने पूरे परिसर को घेरकर ड्रोन की निगरानी में रेड मारी थी। एसडीएम व पुलिस बल द्वारा करीब तीन घंटे की छापामार कार्रवाई में पकड़े गए 22 कथित दलालों को काकादेव थाना पुलिस के हवाले किया गया था। साथ ही नकदी में गड़बड़ी मिलने पर सीनियर क्लर्क समेत 15 अधिकारियों-बाबुओं और बिचौलियों पर एफआईआर भी दर्ज की गई।
कानपुर आरटीओ कार्यालय पर छापेमारी की बाबत एसडीएम सदर अनुभव सिंह ने बताया था कि विभाग से संबंधित शिकायतें प्रशासन को पहले से मिल रही थीं। ताजा शिकायत एक ट्रक चालक कामता प्रसाद ने की थी जिससे चालान के नाम पर 26,700 रुपये लिए गए, जबकि उसे 21,700 रुपये की रसीद दी गई। शिकायत के बाद उसने जिला प्रशासन से संपर्क किया। इसके बाद पूरे मामले की जांच के लिए छापामार कार्रवाई की गई। जांच के दौरान प्रवर्तन कक्ष में तैनात चालान बाबू मृदुल मिश्रा के पास करीब एक लाख रुपये नकद मिलने की बात सामने आई। मृदुल मिश्रा मौके पर इस रकम का संतोषजनक हिसाब नहीं दे सके। वहीं, कैश विभाग में भी रकम के मिलान के दौरान अंतर सामने आया। कैश डिपार्टमेंट के बाबू विपिन कुमार के पास करीब 15 हजार रुपये कम पाए जाने की जानकारी दी गई है। अलग-अलग स्थानों पर रखी रकम के मिलान में करीब 5 से 7 हजार रुपये और अन्य रकम का भी अंतर मिला। छापेमारी के दौरान एडीसीपी स्पेशल आॅपरेशन सुमित सुधाकर रामटेके ने आरटीओ के रीजनल इंस्पेक्टर (आरआई) संतोष यादव से बंद कमरे में पूछताछ की।Kanpur, UP: A joint SOG and district administration team raided the Kanpur RTO office following complaints of touting and corruption. Led by SOG In-charge Sumit Ramtek and SDM Abhinav Jain, officials used drone surveillance, detained and questioned several individuals, sealed the… pic.twitter.com/v1LDH2ly6E
— IANS (@ians_india) August 24, 2026
सर्वोदयनगर पुलिस चौकी प्रभारी डालचंद्र ने छापेमारी के मामले में एफआइआर दर्ज कराई थी। इसमें दो बाबू विपिन श्रीवास्तव व मधुर मिश्र और 13 दलाल समेत कुल 15 लोग नामजद किए गए। इनके विरुद्ध पुलिस कार्य में बाधा उत्पन्न करना, धोखाधड़ी और संगठित होकर अपराध करने के आरोप में एफआइआर है। नामजद अभियुक्तों में दोनों बाबू और दलाल संजय व हरेंद्र पुलिस की पकड़ से दूर हैं। जिन दलालों की गिरफ्तारी के बाद छोड़ा गया है, उनमें वीरेंद्र बहादुर सिंह, सौरभ तिवारी, दिलीप कुमार सिंह, विशाल अवस्थी, राम चंद्र शुक्ल, ब्रजमोहन नेगी, विपिन गुप्ता, आदेश कुमार बाजपेयी, मनीष गौतम, कमल धारिया, धर्मेंद्र दिवाकर हैं। रेड के दौरान गिरफ्तार किए गए दलालों और बाबुओं से पूछताछ में अहम और चौकाने वाले खुलासे हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक फाइलों में कलर कोडिंग के जरिए भ्रष्टाचार का नेटवर्क चलता था। जिसे सिर्फ वो लोग ही समझ पात थे जो नेटवर्क में शामिल रहते थे। ग्रीन टिक का मतलब फाइल का काम तुरंत करना है और पूरा पेमेंट आ चुका है। वहीं ब्लू टिक का मतलब 50 परसेंट पेमेंट आया है, काम बाद में होगा। वहीं रेड टिक वाली फाइल को रोकना होता था, जबकि ब्लैक टिक से फाइल पेंडिंग रखने का संकेत मिलता था। कुल मिलाकर कानपुर में पड़ी रेड से आरटीओ विभाग में दलालों और कर्मचारियों के आपसी गठजोड़ का स्याह सच भी समने आया।कानपुर के RTO कार्यालय में छापा, दो बाबुओं समेत 15 पर एफआईआर...11 गिरफ्तार
— Nirmal pandey/निर्मल पांडेय 🇮🇳 (@Nirmalpanday15) August 25, 2026
- ड्रोन कैमरा से दलालों पर की गई स्ट्राइक RTO कार्यालय में मची भगदड़#Kanpur #RTO #transport #Lucknow #corruption #viral #trendingréels pic.twitter.com/590cUJAmvJ
कानपुर में पड़ा छापा मगर गाजियाबाद में सब कुछ गुलजार: कमोबेश ऐसे ही हालात गाजियाबाद के जिला संभागीय परिवहन कार्यालय के भी है जहां डिजिटल सिस्टम 'फेल' और दलाल मॉडल 'हिट' नजर आता है। पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करते ही लोगों का सामना कथित 'टेक्निकल एरर', सर्वर डाउन या कागजातों की कमी जैसी अंतहीन आपत्तियों से होता है। ऐसे में लोगों को विभाग के चक्कर काटने को मजबूर होना पड़ता है। दूसरी तरफ, आरटीओ परिसर के ठीक बाहर कतारबद्ध छतरियों के नीचे, चाय की टपरियों और खोखों से चल रहा दलालों का समानांतर दफ्तर हर दिन गुलजार रहता है। दलालों की निगाहें काम कराने आने वालों की तलाशती रहती हैं। सूत्र बताते हैं कि ड्राइविंग लाइसेंस नवीनीकरण की सरकारी फीस कुछ सौ रुपये है, लेकिन दलाल हजारों रूपए ऐंठते हैं। सूत्रों की मानें तो अतिरिक्त सुविधा शुल्क देकर बिना ऑटोमेटेड ट्रैक पर गाड़ी उतारे ही लाइसेंस जारी करने का दावा खुलेआम किया जा रहा है। यही नहीं, वाहनों की फिटनेस भी अवैध कमाई का जरिया बन चुकी है। बिना गाड़ियों को आरटीओ लाए सीधे दलालों की टेबल से फिटनेस की हरी झंडी थमा दी जाती है।
गाजियाबाद से सम्बद्ध नोएडा, हापुड़, बुलंदशहर के एआरटीओ कार्यालयों में भी यही सूरते हाल: गाजियाबाद के आरटीओ कार्यालय के बाहर सक्रिय दलालों की सीधी पैठ अंदर बैठे प्रशासनिक अमले और बाबुओं तक है। सूत्रों का कहना है कि दलाल की तरफ से भेजी गई फाइलों पर अधिकारी बिना किसी सवाल-जवाब के फाइल मंजूर कर देते हैं। जो नागरिक 'फेसलेस' के भरोसे खुद आवेदन करता है, उसकी फाइल वेटिंग लिस्ट में पहुंच जाती है यानि आॅनलाइन आवेदन करने वाले को प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इसके उलट जो आवेदक दलालों के जरिए अपना काम करवाते है उनके पेपरवर्क में कमी होने पर भी पैसों के बल पर काम पूरा करवा दिया जाता है। ये हालात केवल गाजियाबाद आरटीओ कार्यालय के ही नहीं है अपितु इस कार्यालय से सम्बद्ध गौतमबुद्धनगर (नोएडा), हापुड़, बुलंदशहर के एआरटीओ कार्यालय में भी मैनुवली वर्क ज्यादा किया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि दलाल आरटीओ विभाग का अभिन्न अंग बन चुके हैं, विभाग को अधिकारी कम और दलाल ज्यादा चला रहे हैं। प्रशासनिक दावों के बीच सवाल यही है कि जब सारी सेवाएं स्क्रीन पर उपलब्ध हैं, तो फिर आरटीओ के बाहर दलालों का यह संगठित सिंडिकेट किसकी सरपरस्ती में फल-फूल रहा है? विभाग में दलालों की गहरी पैठ से जहां सरकार की नीतियों की धज्जियां उड़ रही हैं तो वहीं विभाग की गोपनीयता भी भंग हो रही है। कुल मिलाकर चर्चा-ए-आम है कि गाजियाबाद आरटीओ कार्यालय में फेसलेस सेवा का असली 'फेस' तो अब भी दलाल ही हैं और चंद अधिकारी-कर्मचारी काली कमाई के लालच में दलालों के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली बन चुके हैं! उम्मीद है कि जिम्मेदार अधिकारी इस कुव्यवस्था को दुरूस्त करने की ठोस पहल करेंगे ताकि शासन की नीतियों का लाभ आम जनता को मिल सके, राजस्व की हानि रूके और विभाग पर भरोसा बना रहे।
गाजियाबाद से सम्बद्ध नोएडा, हापुड़, बुलंदशहर के एआरटीओ कार्यालयों में भी यही सूरते हाल: गाजियाबाद के आरटीओ कार्यालय के बाहर सक्रिय दलालों की सीधी पैठ अंदर बैठे प्रशासनिक अमले और बाबुओं तक है। सूत्रों का कहना है कि दलाल की तरफ से भेजी गई फाइलों पर अधिकारी बिना किसी सवाल-जवाब के फाइल मंजूर कर देते हैं। जो नागरिक 'फेसलेस' के भरोसे खुद आवेदन करता है, उसकी फाइल वेटिंग लिस्ट में पहुंच जाती है यानि आॅनलाइन आवेदन करने वाले को प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इसके उलट जो आवेदक दलालों के जरिए अपना काम करवाते है उनके पेपरवर्क में कमी होने पर भी पैसों के बल पर काम पूरा करवा दिया जाता है। ये हालात केवल गाजियाबाद आरटीओ कार्यालय के ही नहीं है अपितु इस कार्यालय से सम्बद्ध गौतमबुद्धनगर (नोएडा), हापुड़, बुलंदशहर के एआरटीओ कार्यालय में भी मैनुवली वर्क ज्यादा किया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि दलाल आरटीओ विभाग का अभिन्न अंग बन चुके हैं, विभाग को अधिकारी कम और दलाल ज्यादा चला रहे हैं। प्रशासनिक दावों के बीच सवाल यही है कि जब सारी सेवाएं स्क्रीन पर उपलब्ध हैं, तो फिर आरटीओ के बाहर दलालों का यह संगठित सिंडिकेट किसकी सरपरस्ती में फल-फूल रहा है? विभाग में दलालों की गहरी पैठ से जहां सरकार की नीतियों की धज्जियां उड़ रही हैं तो वहीं विभाग की गोपनीयता भी भंग हो रही है। कुल मिलाकर चर्चा-ए-आम है कि गाजियाबाद आरटीओ कार्यालय में फेसलेस सेवा का असली 'फेस' तो अब भी दलाल ही हैं और चंद अधिकारी-कर्मचारी काली कमाई के लालच में दलालों के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली बन चुके हैं! उम्मीद है कि जिम्मेदार अधिकारी इस कुव्यवस्था को दुरूस्त करने की ठोस पहल करेंगे ताकि शासन की नीतियों का लाभ आम जनता को मिल सके, राजस्व की हानि रूके और विभाग पर भरोसा बना रहे।
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