गाजियाबाद आरटीओ में 6 हजार की वसूली से सड़क सुरक्षा को सूली पर लटकाने की तैयारी, आखिर बिना टेस्ट लाइसेंस बांटने का माजरा क्या है?

गाजियाबाद के एडीटीसी की नई व्यवस्था ने खड़े किए सवाल—पहली परीक्षा में अयोग्य आवेदक को दोबारा दक्षता जांचे बिना लाइसेंस कैसे? 300 रुपये की री-टेस्ट व्यवस्था खत्म, अब एक महीने की ट्रेनिंग के नाम पर 6 हजार रुपये

सुमित शर्मा 
----------------
गाजियाबाद। सड़क पर वाहन चलाने की वास्तविक क्षमता परखने के लिए गुलधर स्थित जिले के एकमात्र प्रत्यायन चालन प्रशिक्षण केंद्र (एडीटीसी) में लागू की गई नई व्यवस्था ने संभागीय परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या जिले का परिवहन विभाग अब सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय निजी प्रशिक्षण केंद्रों की तिजोरियाँ भरने का नया जरिया बन चुका है? स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस के स्वचालित टेस्ट में फेल होने वाले आवेदकों के लिए अब पुरानी व्यवस्था के तहत एक सप्ताह बाद महज 300 रुपये देकर दोबारा ड्राइविंग टेस्ट देने का विकल्प नहीं रहेगा। इसके बजाय आवेदक को 6,000 रुपये शुल्क देकर एक महीने का प्रशिक्षण लेना होगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यक्ति को पहली बार स्वचालित ड्राइविंग टेस्ट में वाहन चलाने के निर्धारित मानकों पर खरा नहीं पाया गया, उसे प्रशिक्षण के बाद दोबारा ड्राइविंग टेस्ट दिए बिना स्थायी लाइसेंस आखिर किस आधार पर जारी किया जाएगा? सड़क सुरक्षा से जुड़े जानकारों और वाहन चालकों के बीच यही सवाल नई व्यवस्था को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में है। 
फेल हुए तो दोबारा परीक्षा नहीं, छह हजार देकर प्रशिक्षण!: नई व्यवस्था के मुताबिक, ड्राइविंग टेस्ट में फेल होने वाले आवेदक को अब एक महीने का प्रशिक्षण लेना होगा। इसके लिए उसे करीब 6,000 रुपये शुल्क देना पड़ेगा। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद एडीटीसी केंद्र की ओर से सारथी पोर्टल पर फार्म-5बी जनरेट किया जाएगा और इसी के आधार पर आवेदक को दोबारा स्वचालित ड्राइविंग टेस्ट दिए बिना स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस जारी किया जाएगा।यहीं से पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा होता है। क्या प्रशिक्षण लेना ही वाहन चलाने में दक्ष होने का प्रमाण है? यदि पहली परीक्षा में आवेदक की ड्राइविंग क्षमता मानकों के अनुरूप नहीं थी तो प्रशिक्षण के बाद उसकी वास्तविक दक्षता जांचने के लिए अंतिम परीक्षा क्यों नहीं होगी? 
300 रुपये की परीक्षा से छह हजार रुपये के प्रशिक्षण तक:
 
पहले स्थायी लाइसेंस के टेस्ट में असफल होने वाले आवेदक को एक सप्ताह बाद 300 रुपये का शुल्क जमा कर दोबारा टेस्ट देने का मौका मिलता था। वह अपनी कमी सुधारकर फिर परीक्षा देता था और सफल होने तक प्रक्रिया दोहरा सकता था। अब इस व्यवस्था की जगह छह हजार रुपये के प्रशिक्षण को लाया गया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लाइसेंस प्रक्रिया को आसान बनाने के बजाय इसे आर्थिक रूप से बोझिल नहीं बनाया जा रहा? विरोध कर रहे वाहन चालकों का कहना है कि स्वचालित टेस्ट में पहली बार असफल होना हमेशा यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति वाहन चलाने में पूरी तरह अक्षम है। टेस्ट ट्रैक की तकनीकी प्रक्रिया से अनजान होने या छोटी गलती के कारण भी आवेदक असफल हो सकता है। ऐसे में दोबारा टेस्ट के बजाय सीधे महंगे प्रशिक्षण की व्यवस्था पर पुनर्विचार होना चाहिए। 
  • सड़क सुरक्षा का जनाजा: सबसे खतरनाक और हैरान करने वाला पहलू यह है कि 6 हजार रुपये ऐंठने और एक महीने का प्रशिक्षण पूरा होने के बाद आवेदक का कोई अंतिम ड्राइविंग टेस्ट (Final Re-Test) होगा ही नहीं! ADTC केंद्र सीधे 'सारथी पोर्टल' पर फॉर्म-5B (Form-5B) जनरेट करेगा और RTO बिना कोई सवाल पूछे घर बैठे पक्का ड्राइविंग लाइसेंस जारी कर देगा।

बिना री-टेस्ट लाइसेंस तो सड़क सुरक्षा का क्या?: सबसे गंभीर चिंता सड़क सुरक्षा को लेकर है। ड्राइविंग लाइसेंस महज एक दस्तावेज नहीं, बल्कि यह प्रमाण है कि व्यक्ति सार्वजनिक सड़क पर वाहन चलाने के लिए निर्धारित मानकों को पूरा करता है। जब पहली परीक्षा में कोई आवेदक असफल हो गया तो प्रशिक्षण के बाद स्वतंत्र और अंतिम ड्राइविंग टेस्ट के बिना उसके सड़क पर वाहन चलाने की दक्षता कैसे प्रमाणित होगी, इसका स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है। लोगों का कहना है कि प्रशिक्षण के दौरान व्यक्ति ने वाहन चलाना सीखा या नहीं, उसने निर्धारित मानकों को हासिल किया या नहीं—इसकी अंतिम पुष्टि किसी व्यावहारिक परीक्षा से ही हो सकती है। ऐसे में बिना री-टेस्ट लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था पर परिवहन विभाग को जनता के सवालों का जवाब देना चाहिए। 

RTO और परिवहन विभाग की नीयत पर 4 तीखे सवाल:

  1. ₹6,000 जमा होते ही नौसिखिया 'एक्सपर्ट' कैसे बन जाता है? जब स्वचालित टेस्ट में पहली बार आवेदक असफल रहा, तो बिना दोबारा परीक्षा लिए उसे लाइसेंस देना सड़क पर चल रहे आम लोगों की जान से खिलवाड़ क्यों नहीं है? क्या ₹6,000 की फीस में ऐसा कौन सा चमत्कारिक नुस्खा है जो बिना टेस्ट ही चालक को दक्ष बना देता है?

  2. जानबूझकर फेल करने का नया सिंडिकेट? स्थानीय नागरिकों में भारी आशंका है कि इस नई व्यवस्था के बाद ऑटोमेटेड ट्रैक पर आवेदकों को जानबूझकर फेल किया जाएगा, ताकि उन्हें मजबूरन ₹6,000 की फीस देकर गुलधर सेंटर भेजा जा सके। क्या यह RTO और निजी ADTC सेंटर की मिलीभगत से चल रहा कट-मनी का नया सिंडिकेट है?

  3. प्रदेश में दोहरा कानून क्यों? उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से सिर्फ 17 जिलों (गाजियाबाद, नोएडा, लखनऊ, आगरा, अलीगढ़ आदि) में ही ADTC सेंटर हैं। बाकी 58 जिलों में ₹300 वाली पुरानी व्यवस्था से ही री-टेस्ट हो रहा है। आखिर गाजियाबाद के नागरिकों पर ही यह आर्थिक बोझ और सौतेला व्यवहार क्यों थोपा जा रहा है?

  4. तकनीकी भय का नाजायज फायदा: हर आवेदक पहली बार स्वचालित (Automated) ट्रैक के सेंसर्स और तकनीकी पेचीदगियों को समझने में थोड़ा घबराता है। दूसरी बार में अधिकांश आवेदक आसानी से पास हो जाते हैं। RTO प्रशासन चालकों को अपनी गलती सुधारने का हक न देकर सीधे निजी सेंटर की जेब भरने पर क्यों आमादा है?

लोगों ने लगाए गंभीर आरोप, कहा- कहीं ‘फेल कराओ और प्रशिक्षण बेचो’ मॉडल तो नहीं?: नई व्यवस्था को लेकर कुछ वाहन स्वामियों ने आशंका जताई है कि यदि अंतिम टेस्ट की व्यवस्था समाप्त कर दी गई तो इससे एडीटीसी केंद्र की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर सवाल उठ सकते हैं। विजयनगर निवासी राम कुमार ने बताया कि उनके बेटे को पहली बार स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस टेस्ट में असफल घोषित किया गया था, लेकिन दूसरी बार उसने परीक्षा पास कर ली। उनका सवाल है कि यदि दोबारा परीक्षा का मौका ही नहीं होगा तो ऐसे आवेदकों की वास्तविक दक्षता कैसे सामने आएगी। उन्होंने आशंका जताई कि कहीं ऐसा न हो कि आवेदकों को जानबूझकर टेस्ट में फेल कराकर उन्हें महंगे प्रशिक्षण की ओर धकेला जाए। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन नई व्यवस्था में पारदर्शिता और निगरानी की जरूरत को लेकर यह सवाल जरूर गंभीर है।
टेस्ट की तकनीकी जटिलता भी बनी वजह: 
भोजपुर निवासी विजय चौधरी का कहना है कि एडीटीसी में होने वाला स्वचालित ड्राइविंग टेस्ट तकनीकी रूप से काफी जटिल है। पहली बार परीक्षा देने वाले कई लोग ट्रैक की प्रक्रिया और तकनीकी पहलुओं को समझ नहीं पाते। ऐसे में दूसरी कोशिश में वे आसानी से सफल हो जाते हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि प्रशिक्षण और अंतिम टेस्ट दोनों होने चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रशिक्षण के बाद आवेदक वास्तव में सड़क पर वाहन चलाने के लिए सक्षम है। 
परिवहन विभाग के अधिकारी क्या कहते हैं?: मोटर वाहन निरीक्षक विवेक खरवार के मुताबिक शासन स्तर से नई व्यवस्था लागू की गई है और अब इसी के अनुसार प्रक्रिया अपनाई जाएगी। उन्होंने बताया कि फिलहाल इस व्यवस्था के तहत किसी आवेदक का आवेदन नहीं आया है। विभाग का तर्क है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य असफल आवेदकों को दोबारा टेस्ट में भेजने के बजाय उन्हें प्रशिक्षण देकर वाहन चलाने के लिए तैयार करना है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद फार्म-5बी के माध्यम से आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। लेकिन विभाग के इस तर्क के बावजूद सवाल कायम है कि प्रशिक्षण के बाद अंतिम व्यावहारिक परीक्षा क्यों नहीं? 
जहां एडीटीसी नहीं, वहां पुरानी व्यवस्था जारी: 
प्रदेश के सभी जिलों में एडीटीसी केंद्र उपलब्ध नहीं हैं। आगरा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, मथुरा, एटा, अलीगढ़, लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, सहारनपुर, पीलीभीत, बिजनौर, बाराबंकी, सीतापुर, हरदोई, फर्रुखाबाद और सोनभद्र समेत कुछ जिलों में एडीटीसी केंद्र संचालित हैं। जिन जिलों में एडीटीसी केंद्र नहीं हैं, वहां वर्तमान व्यवस्था के तहत ही ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए जाएंगे। इससे एक ही प्रदेश में ड्राइविंग लाइसेंस पाने की प्रक्रिया अलग-अलग होने का सवाल भी खड़ा होता है।
गाजियाबाद आरटीओ से पारदर्शिता की मांग:  नई व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों के बीच गाजियाबाद के संभागीय परिवहन विभाग के अधिकारियों को यह स्पष्ट करना होगा कि प्रशिक्षण के बाद दोबारा टेस्ट के बिना लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था में सड़क सुरक्षा के मानकों से कोई समझौता नहीं होगा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि प्रशिक्षण की गुणवत्ता की निगरानी कौन करेगा, छह हजार रुपये शुल्क का निर्धारण किस आधार पर हुआ है, प्रशिक्षण पूरा करने वाले आवेदक की वास्तविक ड्राइविंग दक्षता कैसे सुनिश्चित की जाएगी और यदि प्रशिक्षण के बाद भी आवेदक वाहन चलाने में सक्षम नहीं पाया गया तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। सड़क पर उतरने वाला हर चालक किसी न किसी परिवार की सुरक्षा से जुड़ा है। इसलिए ड्राइविंग लाइसेंस की प्रक्रिया में सुविधा और प्रशिक्षण के साथ-साथ अंतिम दक्षता परीक्षण को लेकर उठ रहे सवालों को नजरअंदाज करना सीधे सड़क सुरक्षा के साथ खिलवाड़ का जोखिम पैदा कर सकता है।

ALERT AFSARSHAHI

-विनोद कुमार यादव, संपादक Email:alertafsarshahi@gmail.com "अलर्ट अफसरशाही" राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी मासिक पत्रिका है जो शासन-प्रशासन द्वारा संचालित योजनाओं का प्रचार करने के साथ ही अधिकारी वर्ग द्वारा किए जाने वाले सराहनीय कार्यों को प्रमुखता से प्रकाशित करती है। पत्रिका में स्वास्थ्य एवं शिक्षा से संबंधित विषयों पर जानकारी परक लेख-आलेख विशेष रूप से सम्मिलित किए जाते हैं।

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने