सरकारी कामकाज को संभाल रहे प्राइवेट लड़के तो क्या कर रहे बाबू-अफसर?
कानपुर आरटीओ कार्यालय पर छापेमारी के बाद कई जिलों में निरीक्षण अभियान मगर जांच की आंच से क्यों बचा हुआ है गाजियाबाद आरटीओ कार्यालय?
सुमित शर्मा......................
गाजियाबाद। कानपुर के जिला संभागीय परिवहन (आरटीओ) कार्यालय में बीती 24 अगस्त को छापेमारी के दौरान दलालों की सक्रियता, भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के खुलासे के बाद उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों के आरटीओ/एआरटीओ कार्यालयों में निरीक्षण अभियान चलाया जा रहा है। कानपुर की रेड में दलालों की धरपकड़ के बाद एआरटीओ प्रशासन और एआरटीओ प्रवर्तन को निलंबित किया जा चुका है। इसके अलावा दो लिपिकों (बाबुओं) को भी सस्पेंड कर 15 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। इसके बाद से ही परिवहन विभाग के कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार, दलालों पर अंकुश लगाने के लिए शासन-प्रशासन की ओर से अन्य जनपदों के कार्यालयों का औचक निरीक्षण कराया जा रहा है। इसी क्रम में हमीरपुर, महोबा, फतेहपुर, कन्नौज में एआरटीओ कार्यालयों में निरीक्षण किए जा चुके हैं लेकिन अचरज वाली बात यह है कि गाजियाबाद का आरटीओ कार्यालय इस निरीक्षण अभियान से अब तक अछूता है, जबकि गाजियाबाद के आरटीओ कार्यालय के बाहर दलाल तो अंदर प्राइवेट लोग सरकारी कामकाज को संभाल रहे हैं। गाजियाबाद आरटीओ कार्यालय में प्रवेश करते ही आम नागरिक का सामना सरकारी नियमों से नहीं, बल्कि प्राइवेट सिंडिकेट द्वारा तय 'सिस्टम' से होता है। हर सेवा के लिए सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क से अलग एक समानांतर रेट लिस्ट लागू है। आरटीओ कार्यालय में भ्रष्टाचार का यह सारा खेल इन अवैध प्राइवेट लड़कों के जरिए चलाया जा रहा है, जिनकी संख्या तीन दर्जन से अधिक है।
एटा: RTO आगरा अखिलेश द्विवेदी के औचक निरीक्षण से @ArtoEtah पर मचा हड़कंप, @RTOAGRA ने कार्यालय पर कार्य कराने आए लोगों से संवाद कर, समस्याओं का तत्काल कराया निपटारा,
— Amit Mathur (@amitmlive) September 5, 2026
विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों को सरकार के मंशानुरूप कार्य करने की दी हिदायत। @uptransportdept @CMOfficeUP pic.twitter.com/YNlP0ao45t
यूपी : जिला फतेहपुर के RTO दफ्तर में दलाली का खुला खेल चल रहा था। ADM और ASP ने छापा मार दिया। 11 दलाल पकड़े गए। परिवहन एक ऐसा विभाग है, जहां पैसा दिए बिना आपका कोई काम हो नहीं सकता।@bnetshukla pic.twitter.com/fMjV0faTiH
— Sachin Gupta (@Sachingupta) September 3, 2026
हमीरपुर
— Asian News UP/UK (@AsianNewsUP_UK) September 6, 2026
ARTO कार्यालय का RTO ने किया औचक निरीक्षण।
हमीरपुर - RTO सुनील दत्त ने आवेदकों से सीधे लिया कार्यालय की व्यवस्था का फीडबैक।
कर्मचारियों के व्यवहार और आवेदन प्रक्रिया को लेकर आवेदकों से की बातचीत।
आवेदकों के जवाब से संतुष्ट नजर आए RTO, पारदर्शिता पर दिया जोर।… pic.twitter.com/tjX5Lug0YF
कन्नौज
— भारत समाचार | Bharat Samachar (@bstvlive) September 5, 2026
➡️️ARTO ऑफिस में भ्रष्टाचार रोकने को क्रॉस चेक
➡️दूसरे जिलो के अधिकारी चेक कर रहे व्यवस्था
➡️RTO प्रवर्तन प्रयागराज सतेंद्र प्रताप का निरीक्षण
➡️कर्मियों के पहचानपत्र का सत्यापन किया
➡️शिकायतों के निस्तारण की चेक की पारदर्शिता@kannaujpolice @dm_kannauj @uptrafficpolice pic.twitter.com/uj7iM88omz
उत्तर प्रदेश सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' नीति की धज्जियां उड़ती देखनी हों तो गाजियाबाद के जिला संभागीय परिवहन (आरटीओ) कार्यालय का चक्कर लगा लेना ही काफी है। यहां सरकारी व्यवस्था के समानांतर कथित तौर पर एक ऐसा अनौपचारिक तंत्र क्रियाशील है जिसमें सरकारी कर्मचारियों की सीटों पर प्राइवेट युवक बैठकर आम लोगों के परिवहन संबंधी काम कर रहे हैं। वाहन स्वामियों से लाइसेंस बनवाने से लेकर वाहन पंजीकरण, परमिट, फिटनेस, ट्रांसफर और अन्य कार्यों तक के लिए सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क से अलग कथित रूप से 'सुविधा शुल्क' वसूला जाता है।
सरकारी शुल्क के ऊपर कथित 'रेट लिस्ट'?: आम नागरिक जब नया ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने, लाइसेंस का नवीनीकरण कराने, नई गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कराने, परमिट बनवाने, रूट निर्धारित कराने, वाहन ट्रांसफर, फिटनेस, नंबर अपडेट अथवा रंग संबंधी कार्यों के लिए आरटीओ कार्यालय पहुंचते हैं तो निर्धारित सरकारी शुल्क के अतिरिक्त कथित तौर पर अलग-अलग रकम मांगी जाती है। नाम न उजागर न करने की शर्त पर कुछ लोग बताते हैं कि गाजियाबाद आरटीओ कार्यालय में परमिट के नाम पर 3,000 से 30,000 रुपये, लाइसेंस की पूरी प्रक्रिया के लिए 10, 000 रुपये तक, वाहन ट्रांसफर के लिए 3,000 से 4,000 रुपये तथा फिटनेस के लिए करीब 500 रुपये तक अतिरिक्त लिए जाते हैं। इसके अलावा अन्य कार्यों के लिए भी अलग-अलग रेट लिस्ट है। आरटीओ कार्यालय में तैनात सरकारी बाबू या कर्मचारी स्वयं कथित रूप से रिश्वत लेने के बजाय निजी युवकों को बैठाकर उनसे काम कराते हैं। यदि कोई जागरूक नागरिक या आवेदक सरकार द्वारा निर्धारित आधिकारिक फीस देकर सीधे काम कराने की जिद करता है, तो उसे सीधे दफ्तर से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। यहां सवाल केवल कथित रिश्वतखोरी का ही नहीं है, बल्कि यह भी है कि सरकारी कार्यालय में निजी व्यक्तियों को काम करने की अनुमति किस स्तर से मिली और सरकारी रिकॉर्ड एवं नागरिकों से जुड़े कार्यों तक उनकी पहुंच कैसे बनी हुई है?
छापे से पहले 'गेट बंद', बाद में निजी युवकों की एंट्री: गाजियाबाद के आरटीओ कार्यालय में दलालों के मकड़जाल और प्राइवेट सिंडिकेट की खबरें जब-तब सामने आती रहती हैं लेकिन अधिकारिक स्तर पर छापेमारी एक लम्बे समय से नहीं हुई है। सूत्रों का दावा है कि शिकायतों के बाद जब कभी भी उच्च अधिकारियों या विजिलेंस की छापेमारी/निरीक्षण का समय आता है तो आरटीओ के कार्यालय के मुख्य द्वार तुरंत बंद कर दिए जाते हैं। छापेमारी टलने या कार्यालय का निर्धारित समय समाप्त होने के बाद, प्राइवेट लड़कों को चोर रास्तों और बंद कमरों में वापस बुलाया जाता है। रात के अंधेरे में सरकारी रजिस्टरों और सर्वरों पर अवैध तरीके से फाइलों का निस्तारण किया जाता है। अगर यह आरोप सही है तो यह जांच का बेहद गंभीर बिंदु हो सकता है। ऐसे में जांच एजेंसियों के लिए यह देखना जरूरी होगा कि निरीक्षण के समय कार्यालय में कौन-कौन मौजूद था, बाद में किसे प्रवेश मिला, किस सीट पर कौन बैठा और किस प्रकार के सरकारी कार्य निजी व्यक्तियों द्वारा किए गए।
मुख्यमंत्री के आदेशों और ट्रांसफर पॉलिसी की खुली अवहेलना: प्राइवेट कर्मचारियों पर प्रतिबंध का उल्लंघन: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा स्पष्ट सर्कुलर जारी किया गया है कि किसी भी सरकारी कार्यालय में कोई भी अनधिकृत या प्राइवेट व्यक्ति काम नहीं करेगा। इसके बावजूद गाजियाबाद आरटीओ कार्यालय में खुलेआम तीन दर्जन से अधिक प्राइवेट लड़के सरकारी सीटों पर बैठकर काम निपटा रहे हैं। 3 साल के ट्रांसफर नियम की धज्जियां: राज्य सरकार के दिशा-निदेर्शों के अनुसार किसी भी कर्मचारी को एक सीट पर अधिकतम 3 वर्ष तक ही तैनात रखा जा सकता है। लेकिन यहाँ कई बाबू सालों से एक ही मलाईदार सीट पर जमे हुए हैं, जिससे उनका दलालों के साथ मजबूत गठजोड़ बन चुका है।
आरटीओ कार्यालय सीधे आम जनता से जुड़ा विभाग है। इसलिए सवाल सिर्फ कथित रिश्वत का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पारदर्शिता का भी है जिसमें नागरिक को अपने वैध काम के लिए सरकारी शुल्क देने के बाद भी अतिरिक्त रकम देने के लिए मजबूर किए जाने के आरोप लग रहे हैं। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस शिकायत को महज कागजी कार्रवाई तक सीमित रखते हैं या आरटीओ कार्यालय की कार्यप्रणाली की वास्तविक जांच कर 'सरकारी सीटों पर निजी तंत्र' के आरोपों का सच सामने लाते हैं। उम्मीद है कि जिम्मेदार अधिकारी इस तरफ ध्यान देंगे और गाजियाबाद आरटीओ कार्यालय में उपरोक्त कथित अनियमितताओं को दूर करेंगे जिससे आमजन को परिवहन विभाग की सुविधाएं सहज सुलभ हो सकें।