जमानत याचिकाओं पर उसी दिन आदेश देने के निर्देश, 4 साल से लंबित मामले पर जताई नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश- जमानत पर आदेश उसी दिन या अगले दिन दें, अपलोड तुरंत करें
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के हाईकोर्ट्स में फैसलों में हो रही देरी पर गंभीर चिंता जताते हुए सख्त निर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित (रिजर्व) रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए। यदि तीन महीने तक फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल उस मामले को चीफ जस्टिस के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को यह महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। अदालत ने विशेष रूप से जमानत याचिकाओं पर त्वरित सुनवाई और तत्काल आदेश जारी करने पर जोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन सुनाया और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए। यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन अवश्य जारी किया जाए। यह निर्देश झारखंड सरकार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिए गए, जिसमें आरोप था कि हाईकोर्ट ने वर्ष 2022 से फैसला सुरक्षित रखकर अब तक सुनाया नहीं है। मामला अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के चार दोषियों की आपराधिक अपील से संबंधित था।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि फैसले में अत्यधिक देरी संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि समय पर न्याय मिलना भी मौलिक अधिकार का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में सभी हाईकोर्ट्स के लिए 12 महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि निजी स्वतंत्रता से जुड़े मामलों, विशेषकर नियमित जमानत और अग्रिम जमानत याचिकाओं में अदालतों को विशेष तेजी दिखानी चाहिए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि जमानत या सजा पर रोक का आदेश जारी होता है, तो उसकी सूचना तुरंत जेल प्रशासन को भेजी जाए, ताकि आरोपी या दोषी को उसी दिन अथवा अगले दिन रिहा किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी मामले में फैसला तीन महीने से अधिक समय तक लंबित रहता है, तो पक्षकार फैसला सुनाने के लिए आवेदन दे सकता है। ऐसे आवेदन पर दो दिन के भीतर सुनवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि चार महीने तक भी फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो पक्षकार चीफ जस्टिस से मामले को दूसरी बेंच को सौंपने की मांग कर सकता है।
शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि सभी हाईकोर्ट्स की वेबसाइट पर यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाए कि फैसला कब सुरक्षित रखा गया, ऑपरेटिव भाग कब सुनाया गया और विस्तृत फैसला कब अपलोड हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि फैसला अपलोड होने के बाद संबंधित पक्षकारों और अधिवक्ताओं को ई-मेल के माध्यम से सूचना दी जानी चाहिए। सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि हाईकोर्ट जज के रूप में अपने 15 वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने कभी भी किसी मामले में फैसला लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा। उन्होंने कहा कि न्याय में अनावश्यक देरी को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए ये निर्देश जारी किए हैं। यह अनुच्छेद शीर्ष अदालत को “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। गौरतलब है कि देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट में इस समय 92 हजार से अधिक मामले लंबित हैं, जबकि देशभर की अदालतों में कुल लंबित मामलों की संख्या 5.49 करोड़ से ज्यादा बताई गई है। इनमें 25 हाईकोर्ट्स में 63 लाख से अधिक मामले लंबित हैं।
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