नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ड्यूटी के दौरान वाहन चलाते समय यदि चालक की हत्या हो जाती है, तो हर मामले को केवल सामान्य हत्या मानकर बीमा दावे से बाहर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि हत्या निजी रंजिश या व्यक्तिगत कारणों से नहीं हुई है और घटना वाहन संचालन के दौरान लूटपाट या अन्य आपराधिक हमले का परिणाम है, तो इसे “दुर्घटना-जनित हत्या” माना जाएगा और बीमा कंपनी को मुआवजा देना होगा।
जस्टिस मनोज कुमार ओहरी की बेंच ने यह फैसला एक ट्रक चालक की मौत के मामले में सुनाया। मृतक एक निजी कंपनी में चालक था और वैध बीमा पॉलिसी के तहत बीमित ट्रक चला रहा था। घटना वाली रात वह ड्यूटी पर था, तभी कुछ अज्ञात लोगों ने उस पर हमला कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।
बीमा कंपनी का तर्क कोर्ट ने किया खारिज: बीमा कंपनी ने अदालत में दलील दी थी कि उनकी पॉलिसी केवल सड़क दुर्घटना में दूसरी गाड़ी की लापरवाही से घायल या मृत हुए चालक और सवारों को ही मुआवजा देने के लिए लागू होती है। कंपनी का कहना था कि हत्या के मामलों को बीमा दायरे में नहीं माना जा सकता।
हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि वाहन चलाते समय अपराधियों का शिकार बने चालक के परिवार को “भगवान भरोसे” नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि चालक को किसी निजी दुश्मनी के कारण निशाना बनाए जाने का कोई ठोस सबूत नहीं है, तो ऐसी घटना को आकस्मिक या दुर्घटना-जनित माना जाएगा।
निजी रंजिश और दुर्घटना-जनित हत्या में अंतर: बेंच ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 का हवाला देते हुए हत्या और आकस्मिक हत्या के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि यदि किसी विशेष व्यक्ति को जानबूझकर मारना मुख्य उद्देश्य हो, तो वह सामान्य हत्या मानी जाएगी। लेकिन यदि हमला लूटपाट या अन्य आपराधिक इरादे से किया गया हो और मौत उसी दौरान हुई हो, तो वह दुर्घटना-जनित हत्या के दायरे में आ सकती है। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि मृतक को निजी कारणों से निशाना बनाया गया था। इसलिए चालक की मौत को “दुर्घटना-जनित हत्या” मानते हुए पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
फैसले का व्यापक असर: कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाईकोर्ट का यह फैसला ट्रांसपोर्ट सेक्टर में काम करने वाले हजारों ड्राइवरों और उनके परिवारों के लिए राहत भरा माना जा रहा है। इससे भविष्य में बीमा कंपनियों द्वारा ऐसे मामलों में दावे खारिज करना आसान नहीं होगा।
बीमा कंपनी का तर्क कोर्ट ने किया खारिज: बीमा कंपनी ने अदालत में दलील दी थी कि उनकी पॉलिसी केवल सड़क दुर्घटना में दूसरी गाड़ी की लापरवाही से घायल या मृत हुए चालक और सवारों को ही मुआवजा देने के लिए लागू होती है। कंपनी का कहना था कि हत्या के मामलों को बीमा दायरे में नहीं माना जा सकता।
हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि वाहन चलाते समय अपराधियों का शिकार बने चालक के परिवार को “भगवान भरोसे” नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि चालक को किसी निजी दुश्मनी के कारण निशाना बनाए जाने का कोई ठोस सबूत नहीं है, तो ऐसी घटना को आकस्मिक या दुर्घटना-जनित माना जाएगा।
निजी रंजिश और दुर्घटना-जनित हत्या में अंतर: बेंच ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 का हवाला देते हुए हत्या और आकस्मिक हत्या के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि यदि किसी विशेष व्यक्ति को जानबूझकर मारना मुख्य उद्देश्य हो, तो वह सामान्य हत्या मानी जाएगी। लेकिन यदि हमला लूटपाट या अन्य आपराधिक इरादे से किया गया हो और मौत उसी दौरान हुई हो, तो वह दुर्घटना-जनित हत्या के दायरे में आ सकती है। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि मृतक को निजी कारणों से निशाना बनाया गया था। इसलिए चालक की मौत को “दुर्घटना-जनित हत्या” मानते हुए पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
फैसले का व्यापक असर: कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाईकोर्ट का यह फैसला ट्रांसपोर्ट सेक्टर में काम करने वाले हजारों ड्राइवरों और उनके परिवारों के लिए राहत भरा माना जा रहा है। इससे भविष्य में बीमा कंपनियों द्वारा ऐसे मामलों में दावे खारिज करना आसान नहीं होगा।
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