मानवाधिकारों पर भ्रम और भारत की वास्तविक तस्वीर...
इन दिनों एक झूठ गढ़ने की कोशिश की जा रही है कि भारत में मानवाधिकारों को ख़तरा है, यह बात देश विरोधी मीडिया को भी बहुत भा रहा है क्योंकि इससे उनके राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध हो रहे हैं।
भारत विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या (लगभग 1.4 अरब) और अभूतपूर्व धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता वाला देश है। निरपेक्ष संख्या में मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएँ बड़ी दिख सकती हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति और विविधता के संदर्भ में इनकी तुलना अन्य देशों से की जाए तो भारतीयों की स्थिति सबसे बेहतर है।
यूएनओडीसी, अवर वर्ड इन डेटा, एनसीआरबी, ग्लोबल पीस इंडेक्स इत्यादि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के डेटा से ही स्पष्ट हो जाता है कि भारत की स्थिति लोकतंत्र की रक्षा और मानवाधिकार में कितनी मज़बूत है। दुनिया के प्रमुख धर्मों में से कई, एक साथ, सबसे अधिक संख्या में भारत में मौजूद हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की जनसंख्या में हिंदू 79.8%, मुस्लिम 14.2%, ईसाई 2.3%, सिख 1.7%, बौद्ध 0.7% और जैन 0.4% हैं। इसके अलावा पारसी, यहूदी, बहाई और विभिन्न आदिवासी धर्म भी यहां फलते-फूलते हैं। भारत दुनिया में हिंदुओं की सबसे बड़ी आबादी (लगभग 94%) का घर है और इंडोनेशिया के बाद मुस्लिमों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। यह विविधता सदियों से भारत की पहचान रही है, जहां अलग-अलग धर्म, भाषाएँ, रीति-रिवाज और परंपराएँ एक साथ रहती हैं।
भारत उन चुनिंदा देशों में है जहां मानव अधिकारों को संविधान प्रदत्त अधिकार दिए गए हैं। भारतीय संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12-35) में मौलिक अधिकारों का विस्तृत वर्णन है, जिसमें समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18), स्वतंत्रता का अधिकार (19-22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (23-24), धर्म की स्वतंत्रता (25-28), सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (29-30) तथा संवैधानिक उपचार का अधिकार (32) शामिल हैं। ये अधिकार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं तथा राज्य द्वारा किसी भी भेदभाव को रोकते हैं। संविधान सभी नागरिकों को बिना भेदभाव के ये अधिकार प्रदान करता है।
भारत में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को मतदान का अधिकार प्रदान किया जाता है, भले ही उसे सरकार द्वारा टैक्स के लिए बाध्य न किया गया हो। भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार है। 1950 के संविधान के लागू होने के साथ ही 18 वर्ष से ऊपर के सभी वयस्क नागरिकों—चाहे वे पुरुष हों, महिला हों, किसी भी धर्म, जाति या आर्थिक स्थिति के—को मतदान का अधिकार मिला। मतदान संपत्ति, कर भुगतान या किसी अन्य योग्यता पर निर्भर नहीं है। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव है।
ऐसे देश में मानव अधिकारों के हनन का आरोप लगाना सरासर गलत और पूर्वाग्रह से ग्रसित है। जब संविधान मौलिक अधिकार प्रदान करता है, सार्वभौमिक मताधिकार सुनिश्चित करता है और विविधता को अपनाता है, तब चुनिंदा घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना निष्पक्ष नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह दर्शाता है।भारत जैसे विविधता वाले एक स्वस्थ लोकतंत्र में अधिकारों के हनन के आरोप प्रायः राजनीति से ग्रसित होते हैं। साधारण आपराधिक मामलों को भी जाति और धर्म के चश्मे से देखने की कोशिश की जाती है। एक ही घटना को जरूरत पड़ने पर बच्चों का उत्पीड़न, उसी घटना को दलित उत्पीड़न, वैसी ही किसी अन्य घटना को उत्पीड़न का प्रतिशोध और किसी भी आपराधिक घटना को मानव अधिकार का हनन बता देना बहुत ही राजनैतिक पूर्वाग्रह होते हैं।भारत इतनी विविधता का देश है कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात सिद्ध न कर पाने की स्थिति में भी राजनैतिक दल प्रायः इस तरह के आरोप लगाते रहते हैं। निरपेक्ष रूप से यदि देखें तो भारत में उत्पीड़न की घटनाएँ दिख सकती हैं, क्योंकि कोई भी बड़ा समाज अपराधों से मुक्त नहीं होता, लेकिन नॉर्वे और भारत की तुलना करें तो आबादी और विविधता के लिहाज से ये आंकड़े बहुत छोटे दिखाई पड़ेंगे।भारत की जनसंख्या नॉर्वे से लगभग 250 गुना अधिक है और सांस्कृतिक-धार्मिक विविधता अपार है। हत्या की दर भारत में नॉर्वे की तुलना में अधिक है, लेकिन कुल अपराधों की संख्या और जटिलता को ध्यान में रखते हुए प्रति व्यक्ति आधार पर तुलना में भारत का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर संदर्भ में देखा जा सकता है। विविधता वाले विशाल समाज में, लोकतंत्र चलाना स्वयं में चुनौतीपूर्ण है।
भारत की मौजूदा सरकार महानता में विश्वास करती है और महान होने की चाहत रखने वाला देश सभी को आदर और प्रेम पूर्ण मैत्री का संदेश देता है न कि नफरत और दरिंदगी। सरकार की पहलें जैसे 'एक भारत श्रेष्ठ भारत', सांस्कृतिक आदान-प्रदान, विविधता को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम और राष्ट्रीय एकता के संदेश इस दिशा में काम करते हैं। भारत सदियों से 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का संदेश देता आया है।
मानवाधिकार हनन के लिए मानव हत्या की दर को सबसे प्रमुख मापदंड माना जाता है।2022 में भारत में लगभग 2.815 प्रति 1लाख व्यक्ति हैं, जबकि वैश्विक औसत 5.6-5.9 के लगभग है। नॉर्वे, स्वीडन, आइसलैंड, जापान इत्यादि में यह दर 1 से भी कम है लेकिन अमेरिका में 5.76 और लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के कई देश में यह 10-50 प्रति 1लाख है, तो मानव अधिकार की चिंता उन देशों में करनी चाहिए या यहाँ ? यह तथ्य है कि 108 देशों वाली सूची में भारत 46वें स्थान पर है परंतु इसकी आबादी और विविधता सबसे अधिक है। यदि भारत की आबादी नॉर्वे जितनी होती तो अनुमानित हत्या मात्र कुछ सौ रहतीं, जबकि वर्तमान में बड़ी आबादी के कारण कुल संख्या अधिक दिखती है।
समग्र अपराध दर और अन्य संकेतक की दृष्टि से भी भारत का प्रदर्शन बहुत अच्छा है। कुल IPC अपराध दर प्रति व्यक्ति कई विकसित देशों से कम या तुलनात्मक है, खासकर संपत्ति संबंधी अपराधों में। ग्लोबल पीस इंडेक्स (GPI) 2025 में भारत स्थिति ख़राब ज़रूर है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इससे बेहतर देशों में धार्मिक, क्षेत्रीय तथा भाषाई विविधता बहुत कम है। विदेशी संस्थानों - वी-डेम ह्यूमन राइट इंडेक्स और फ़्रीडम हाउस द्वारा भारत को 66/100 स्कोर के साथ भेदभाव रहित बताया गया, क्या विदेशी संस्थानों की यह घोषणाएँ झूठ हैं ? विशाल लोकतंत्र और विविधता को देखते हुए भारत के लिए यह लक्ष्य हासिल करना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
विविध आंकड़े, भारत को कई हिंसक समाजों जैसे ब्राजील, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका इत्यादि से बहुत बेहतर दिखाते हैं। विकसित देशों (यूरोप) में स्थित अधिक सुखद ज़रूर दिखती है लेकिन उनकी आबादी छोटी, समरूप और उच्च आय है। भारत की धार्मिक-जातीय विविधता कई संघर्षों का स्रोत अवश्य हो सकती है, फिर भी प्रति व्यक्ति उल्लंघन दर कम रहती है।
भारत विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या (लगभग 1.4 अरब) और अभूतपूर्व धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता वाला देश है। निरपेक्ष संख्या में मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएँ बड़ी दिख सकती हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति और विविधता के संदर्भ में इनकी तुलना अन्य देशों से की जाए तो भारतीयों की स्थिति सबसे बेहतर है।
यूएनओडीसी, अवर वर्ड इन डेटा, एनसीआरबी, ग्लोबल पीस इंडेक्स इत्यादि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के डेटा से ही स्पष्ट हो जाता है कि भारत की स्थिति लोकतंत्र की रक्षा और मानवाधिकार में कितनी मज़बूत है। दुनिया के प्रमुख धर्मों में से कई, एक साथ, सबसे अधिक संख्या में भारत में मौजूद हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की जनसंख्या में हिंदू 79.8%, मुस्लिम 14.2%, ईसाई 2.3%, सिख 1.7%, बौद्ध 0.7% और जैन 0.4% हैं। इसके अलावा पारसी, यहूदी, बहाई और विभिन्न आदिवासी धर्म भी यहां फलते-फूलते हैं। भारत दुनिया में हिंदुओं की सबसे बड़ी आबादी (लगभग 94%) का घर है और इंडोनेशिया के बाद मुस्लिमों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। यह विविधता सदियों से भारत की पहचान रही है, जहां अलग-अलग धर्म, भाषाएँ, रीति-रिवाज और परंपराएँ एक साथ रहती हैं।
भारत उन चुनिंदा देशों में है जहां मानव अधिकारों को संविधान प्रदत्त अधिकार दिए गए हैं। भारतीय संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12-35) में मौलिक अधिकारों का विस्तृत वर्णन है, जिसमें समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18), स्वतंत्रता का अधिकार (19-22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (23-24), धर्म की स्वतंत्रता (25-28), सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (29-30) तथा संवैधानिक उपचार का अधिकार (32) शामिल हैं। ये अधिकार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं तथा राज्य द्वारा किसी भी भेदभाव को रोकते हैं। संविधान सभी नागरिकों को बिना भेदभाव के ये अधिकार प्रदान करता है।
भारत में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को मतदान का अधिकार प्रदान किया जाता है, भले ही उसे सरकार द्वारा टैक्स के लिए बाध्य न किया गया हो। भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार है। 1950 के संविधान के लागू होने के साथ ही 18 वर्ष से ऊपर के सभी वयस्क नागरिकों—चाहे वे पुरुष हों, महिला हों, किसी भी धर्म, जाति या आर्थिक स्थिति के—को मतदान का अधिकार मिला। मतदान संपत्ति, कर भुगतान या किसी अन्य योग्यता पर निर्भर नहीं है। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव है।
ऐसे देश में मानव अधिकारों के हनन का आरोप लगाना सरासर गलत और पूर्वाग्रह से ग्रसित है। जब संविधान मौलिक अधिकार प्रदान करता है, सार्वभौमिक मताधिकार सुनिश्चित करता है और विविधता को अपनाता है, तब चुनिंदा घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना निष्पक्ष नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह दर्शाता है।भारत जैसे विविधता वाले एक स्वस्थ लोकतंत्र में अधिकारों के हनन के आरोप प्रायः राजनीति से ग्रसित होते हैं। साधारण आपराधिक मामलों को भी जाति और धर्म के चश्मे से देखने की कोशिश की जाती है। एक ही घटना को जरूरत पड़ने पर बच्चों का उत्पीड़न, उसी घटना को दलित उत्पीड़न, वैसी ही किसी अन्य घटना को उत्पीड़न का प्रतिशोध और किसी भी आपराधिक घटना को मानव अधिकार का हनन बता देना बहुत ही राजनैतिक पूर्वाग्रह होते हैं।भारत इतनी विविधता का देश है कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात सिद्ध न कर पाने की स्थिति में भी राजनैतिक दल प्रायः इस तरह के आरोप लगाते रहते हैं। निरपेक्ष रूप से यदि देखें तो भारत में उत्पीड़न की घटनाएँ दिख सकती हैं, क्योंकि कोई भी बड़ा समाज अपराधों से मुक्त नहीं होता, लेकिन नॉर्वे और भारत की तुलना करें तो आबादी और विविधता के लिहाज से ये आंकड़े बहुत छोटे दिखाई पड़ेंगे।भारत की जनसंख्या नॉर्वे से लगभग 250 गुना अधिक है और सांस्कृतिक-धार्मिक विविधता अपार है। हत्या की दर भारत में नॉर्वे की तुलना में अधिक है, लेकिन कुल अपराधों की संख्या और जटिलता को ध्यान में रखते हुए प्रति व्यक्ति आधार पर तुलना में भारत का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर संदर्भ में देखा जा सकता है। विविधता वाले विशाल समाज में, लोकतंत्र चलाना स्वयं में चुनौतीपूर्ण है।
भारत की मौजूदा सरकार महानता में विश्वास करती है और महान होने की चाहत रखने वाला देश सभी को आदर और प्रेम पूर्ण मैत्री का संदेश देता है न कि नफरत और दरिंदगी। सरकार की पहलें जैसे 'एक भारत श्रेष्ठ भारत', सांस्कृतिक आदान-प्रदान, विविधता को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम और राष्ट्रीय एकता के संदेश इस दिशा में काम करते हैं। भारत सदियों से 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का संदेश देता आया है।
मानवाधिकार हनन के लिए मानव हत्या की दर को सबसे प्रमुख मापदंड माना जाता है।2022 में भारत में लगभग 2.815 प्रति 1लाख व्यक्ति हैं, जबकि वैश्विक औसत 5.6-5.9 के लगभग है। नॉर्वे, स्वीडन, आइसलैंड, जापान इत्यादि में यह दर 1 से भी कम है लेकिन अमेरिका में 5.76 और लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के कई देश में यह 10-50 प्रति 1लाख है, तो मानव अधिकार की चिंता उन देशों में करनी चाहिए या यहाँ ? यह तथ्य है कि 108 देशों वाली सूची में भारत 46वें स्थान पर है परंतु इसकी आबादी और विविधता सबसे अधिक है। यदि भारत की आबादी नॉर्वे जितनी होती तो अनुमानित हत्या मात्र कुछ सौ रहतीं, जबकि वर्तमान में बड़ी आबादी के कारण कुल संख्या अधिक दिखती है।
समग्र अपराध दर और अन्य संकेतक की दृष्टि से भी भारत का प्रदर्शन बहुत अच्छा है। कुल IPC अपराध दर प्रति व्यक्ति कई विकसित देशों से कम या तुलनात्मक है, खासकर संपत्ति संबंधी अपराधों में। ग्लोबल पीस इंडेक्स (GPI) 2025 में भारत स्थिति ख़राब ज़रूर है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इससे बेहतर देशों में धार्मिक, क्षेत्रीय तथा भाषाई विविधता बहुत कम है। विदेशी संस्थानों - वी-डेम ह्यूमन राइट इंडेक्स और फ़्रीडम हाउस द्वारा भारत को 66/100 स्कोर के साथ भेदभाव रहित बताया गया, क्या विदेशी संस्थानों की यह घोषणाएँ झूठ हैं ? विशाल लोकतंत्र और विविधता को देखते हुए भारत के लिए यह लक्ष्य हासिल करना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
विविध आंकड़े, भारत को कई हिंसक समाजों जैसे ब्राजील, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका इत्यादि से बहुत बेहतर दिखाते हैं। विकसित देशों (यूरोप) में स्थित अधिक सुखद ज़रूर दिखती है लेकिन उनकी आबादी छोटी, समरूप और उच्च आय है। भारत की धार्मिक-जातीय विविधता कई संघर्षों का स्रोत अवश्य हो सकती है, फिर भी प्रति व्यक्ति उल्लंघन दर कम रहती है।
-डॉ अतुल गोयल, (सहायक आचार्य, अर्थशास्त्र) बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी
Contact No: 8795745410 Email: dr.atulgoyal3.46@gmail.com
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