गाजियाबाद में खाकी की बेरुखी ने छीनी फरियादी की जिंदगी, मदद की आस में टूट गई सांसों की डोर

'पिंक बूथ' पर तड़प-तड़प कर मरा राजकुमार, नहीं पसीजा सिस्टम; उजड़ गया एक गर्भवती पत्नी का सुहाग

गाजियाबाद
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गाजियाबाद से एक ऐसी दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जो खाकी की संवेदनशीलता और सुरक्षा के बड़े-बड़े दावों पर एक गहरा जख्म छोड़ जाती है। सुरक्षा और तत्काल सहायता का भरोसा देने वाले 'पिंक बूथ' के बंद दरवाजे और पुलिसकर्मियों की कथित बेरुखी ने एक 22 साल के मासूम नौजवान की जिंदगी छीन ली। बिहार के सीवान जिले के बढुलिया गांव से आकर, गाजियाबाद के संजयनगर में रहकर मेहनत-मजदूरी करने वाले राजकुमार को क्या पता था कि जिस पुलिस व्यवस्था को वो अपनी ढाल समझकर दौड़ रहा था, वही उसकी आखिरी उम्मीद को भी तोड़ देगी। 
एक ऑटो का विवाद और बंद दरवाजे: रविवार की वह दोपहर राजकुमार के लिए काल बनकर आई। एक ऑटो चालक से किराए को लेकर मामूली कहासुनी हुई, जो देखते ही देखते धक्कामुक्की में बदल गई। डर और घबराहट से सहमा राजकुमार खुद को बचाने के लिए पास ही बने पिंक बूथ की तरफ भागा। उसे लगा होगा कि वहां पुलिस है, कानून है, वो सुरक्षित हो जाएगा। लेकिन, जब वह हांफते हुए वहां पहुंचा, तो सुरक्षा का वो मुख्य गेट बंद था। राजकुमार हार नहीं माना; वह दूसरे रास्ते से किसी तरह परिसर के भीतर दाखिल हुआ और वहां मौजूद पुलिसकर्मियों से मदद की गुहार लगाने लगा। 
घबराहट में टूटा शीशा, बहने लगी जिंदगी:
मदद न मिलने की बेबसी, सामने खड़ा खतरा और पुलिस की बेरुखी ने राजकुमार को इस कदर तोड़ दिया कि उसने गुस्से और घबराहट में पिंक बूथ के ही एक शीशे पर हाथ मार दिया। कांच का वो टुकड़ा उसकी कलाई की नसों को काटता हुआ अंदर धंस गया। खून का फव्वारा छूट पड़ा, लेकिन दर्द से तड़पते हुए भी वह नौजवान पुलिस परिसर में और फिर सड़क पर आकर लोगों से, पुलिस से मदद की भीख मांगता रहा।
  • लापरवाही के 40 मिनट: चश्मदीदों का कहना है कि करीब 40 मिनट तक तड़पने के बाद एंबुलेंस मौके पर पहुंची। तब तक सड़क से लेकर बूथ परिसर तक राजकुमार का खून बह चुका था और उसकी सांसें उखड़ने लगी थीं। आखिरकार, अस्पताल में इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया।

  • तथ्य छुपाने की कोशिश? लोगों का आरोप है कि जहां एक तरफ राजकुमार जिंदगी की जंग हार रहा था, वहीं पुलिस ने फुर्ती दिखाते हुए घटना के कुछ ही देर बाद बूथ का टूटा हुआ शीशा बदलवा दिया।

"नशे में था, तो क्या इंसान नहीं था?": 
पुलिस अधिकारी अब दलील दे रहे हैं कि शुरुआती जांच में युवक के नशे में होने की बात सामने आई है। लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर कोई इंसान नशे में था, तो क्या उसकी जान की कोई कीमत नहीं थी? क्या मुसीबत में फंसे किसी शख्स की बात सिर्फ इसलिए नहीं सुनी जाएगी क्योंकि उसने शराब पी रखी थी? हालांकि, डीसीपी सिटी धवल जायसवाल ने माना है कि पुलिसकर्मियों को उसकी बात सुननी चाहिए थी और मामले की जांच के लिए टीम गठित कर दी गई है। 
श्मशान से पिंक बूथ तक आक्रोश: पोस्टमार्टम के बाद जब राजकुमार का शव वाल्मीकि श्मशान घाट पर पंचतत्व में विलीन हुआ, तो उसके पीछे अपनों का गम गुस्से में बदल गया। दाह संस्कार के बाद आक्रोशित परिजनों और स्थानीय लोगों ने उसी पिंक बूथ का घेराव कर दिया, जहां राजकुमार ने दम तोड़ा था। मृतक के भाई अजय का आरोप सीधा है—"अगर समय रहते उपचार मिल जाता, तो मेरा भाई आज जिंदा होता।" मधुबन बापूधाम थाना प्रभारी ने मौके पर पहुंचकर किसी तरह उचित कार्रवाई का भरोसा देकर लोगों को शांत कराया। 
पीछे छूट गया उजड़ा हुआ संसार:
राजकुमार तो इस दुनिया से चला गया, लेकिन अपने पीछे वह एक ऐसा दर्द छोड़ गया है जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। उसकी पत्नी गुड़िया, जो इस समय 8 महीने की गर्भवती है, उसके सिर से पति का साया उठ चुका है। जिस बच्चे के आने की खुशियां घर में मनाई जा रही थीं, अब उसके जन्म से पहले ही घर में मातम का सन्नाटा पसरा हुआ है। पति की मौत के सदमे से गुड़िया की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है।
यह घटना सिर्फ एक युवक की मौत नहीं है, बल्कि उस भरोसे की मौत है जो एक आम नागरिक खाकी की वर्दी पर करता है। जांच की रिपोर्ट जो भी आए, लेकिन गुड़िया के आंसुओं और अजन्मे बच्चे के सवालों का जवाब शायद ही कभी यह सिस्टम दे पाएगा।

ALERT AFSARSHAHI

-विनोद कुमार यादव, संपादक Email:alertafsarshahi@gmail.com "अलर्ट अफसरशाही" राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी मासिक पत्रिका है जो शासन-प्रशासन द्वारा संचालित योजनाओं का प्रचार करने के साथ ही अधिकारी वर्ग द्वारा किए जाने वाले सराहनीय कार्यों को प्रमुखता से प्रकाशित करती है। पत्रिका में स्वास्थ्य एवं शिक्षा से संबंधित विषयों पर जानकारी परक लेख-आलेख विशेष रूप से सम्मिलित किए जाते हैं।

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