रविंद्र आर्य
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नई दिल्ली। मोर पंख की पिच्छी को लेकर उठे विवाद में अब एक महत्वपूर्ण मोड़ सामने आया है। शुरुआत में मोर पंख के इस्तेमाल को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले जैन आचार्य सूर्यसागर महाराज ने अब कथित तौर पर इस मामले की जमीनी हकीकत को समझने के बाद पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) की संचालक और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के प्रयासों की सराहना की है।
आचार्य सूर्यसागर महाराज का कहना है कि मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी पूरे समाज की है। उनके अनुसार हिन्दू और जैन समाज में मोर पंख का धार्मिक एवं सांस्कृतिक इस्तेमाल लंबे समय से होता रहा है, लेकिन अब यह गंभीरता से देखने की जरूरत है कि कहीं इसी मांग का फायदा उठाकर मोरों के पंख नोचकर निकालने और बेचने का अवैध कारोबार तो नहीं किया जा रहा।
पहले विरोध, अब मेनका गांधी के प्रयासों की सराहना: मोर पंख की पिच्छी के मुद्दे पर पहले आचार्य सूर्यसागर महाराज की ओर से मेनका गांधी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई थी। हालांकि, अब उनके रुख में बदलाव दिखाई दे रहा है। महाराज ने कथित तौर पर कहा कि जब उन्होंने इस पूरे विषय की वास्तविक स्थिति को समझा तो उन्हें महसूस हुआ कि मेनका गांधी ने जिस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यदि राष्ट्रीय पक्षी मोर के पंखों को बाजार में बेचने के लिए उसके शरीर से जबरन नोचा जा रहा है, तो यह न केवल वन्यजीवों के प्रति क्रूरता है बल्कि समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न भी है। आचार्य सूर्यसागर महाराज के इस रुख को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह विवाद केवल मोर पंख की पिच्छी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब इसका केंद्र मोर संरक्षण, अवैध व्यापार और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन बन गया है।
PFA के सौरव गुप्ता के कार्यों का भी उल्लेख: इस दौरान जैन मुनि महाराज ने पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) से जुड़े एक्टिव सदस्य सौरव गुप्ता के कार्यों की भी सराहना की। विशेष रूप से दिल्ली के जामा मस्जिद क्षेत्र में पशु-पक्षियों के साथ कथित अत्याचार और अवैध व्यापार के खिलाफ हुई कार्रवाई का उल्लेख किया गया।
महाराज के अनुसार PFA ने पुलिस प्रशासन के साथ मिलकर कार्रवाई कराई और बड़ी संख्या में पशु-पक्षियों को राहत दिलाने का काम किया। इस कार्रवाई के बाद कई पक्षियों को कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से संरक्षण मिला तथा उनके उपचार और देखभाल की व्यवस्था की गई। बताया गया कि रेस्क्यू किए गए पक्षियों में से बड़ी संख्या को उपचार के लिए दिल्ली के प्रसिद्ध संजय गांधी एनिमल केयर सेंटर/अस्पताल जैसी पशु चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंचाया गया।
नई दिल्ली। मोर पंख की पिच्छी को लेकर उठे विवाद में अब एक महत्वपूर्ण मोड़ सामने आया है। शुरुआत में मोर पंख के इस्तेमाल को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले जैन आचार्य सूर्यसागर महाराज ने अब कथित तौर पर इस मामले की जमीनी हकीकत को समझने के बाद पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) की संचालक और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के प्रयासों की सराहना की है।
आचार्य सूर्यसागर महाराज का कहना है कि मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी पूरे समाज की है। उनके अनुसार हिन्दू और जैन समाज में मोर पंख का धार्मिक एवं सांस्कृतिक इस्तेमाल लंबे समय से होता रहा है, लेकिन अब यह गंभीरता से देखने की जरूरत है कि कहीं इसी मांग का फायदा उठाकर मोरों के पंख नोचकर निकालने और बेचने का अवैध कारोबार तो नहीं किया जा रहा।
पहले विरोध, अब मेनका गांधी के प्रयासों की सराहना: मोर पंख की पिच्छी के मुद्दे पर पहले आचार्य सूर्यसागर महाराज की ओर से मेनका गांधी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई थी। हालांकि, अब उनके रुख में बदलाव दिखाई दे रहा है। महाराज ने कथित तौर पर कहा कि जब उन्होंने इस पूरे विषय की वास्तविक स्थिति को समझा तो उन्हें महसूस हुआ कि मेनका गांधी ने जिस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यदि राष्ट्रीय पक्षी मोर के पंखों को बाजार में बेचने के लिए उसके शरीर से जबरन नोचा जा रहा है, तो यह न केवल वन्यजीवों के प्रति क्रूरता है बल्कि समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न भी है। आचार्य सूर्यसागर महाराज के इस रुख को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह विवाद केवल मोर पंख की पिच्छी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब इसका केंद्र मोर संरक्षण, अवैध व्यापार और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन बन गया है।
PFA के सौरव गुप्ता के कार्यों का भी उल्लेख: इस दौरान जैन मुनि महाराज ने पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) से जुड़े एक्टिव सदस्य सौरव गुप्ता के कार्यों की भी सराहना की। विशेष रूप से दिल्ली के जामा मस्जिद क्षेत्र में पशु-पक्षियों के साथ कथित अत्याचार और अवैध व्यापार के खिलाफ हुई कार्रवाई का उल्लेख किया गया।
महाराज के अनुसार PFA ने पुलिस प्रशासन के साथ मिलकर कार्रवाई कराई और बड़ी संख्या में पशु-पक्षियों को राहत दिलाने का काम किया। इस कार्रवाई के बाद कई पक्षियों को कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से संरक्षण मिला तथा उनके उपचार और देखभाल की व्यवस्था की गई। बताया गया कि रेस्क्यू किए गए पक्षियों में से बड़ी संख्या को उपचार के लिए दिल्ली के प्रसिद्ध संजय गांधी एनिमल केयर सेंटर/अस्पताल जैसी पशु चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंचाया गया।
“मेनका गांधी के अलावा कौन खुलकर खड़ा होगा?”: आचार्य सूर्यसागर महाराज ने मेनका गांधी की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि पशु-पक्षियों के अधिकारों के लिए जिस तरह PFA लगातार प्रशासन और पुलिस के सामने आवाज उठाती है, वह अपने आप में उल्लेखनीय है। उनके अनुसार पशु क्रूरता के मामलों में केवल बयान देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत पड़ने पर पुलिस कार्रवाई कराना, पशुओं को रेस्क्यू कराना, उन्हें चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना और फिर अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ना एक लंबी प्रक्रिया है। इसी संदर्भ में उन्होंने मेनका गांधी और PFA के कार्यों को साहसिक और सराहनीय प्रयास बताया।
जामा मस्जिद कार्रवाई बनी उदाहरण: हाल ही में दिल्ली के जामा मस्जिद क्षेत्र में पशु-पक्षियों के कथित अवैध व्यापार और क्रूरता के खिलाफ हुई कार्रवाई ने भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है। कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में पशु-पक्षियों को रेस्क्यू किए जाने और दुकानों के खिलाफ कार्रवाई की बात सामने आई। PFA से जुड़े सौरव गुप्ता की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा गया कि संस्था ने इस मामले में केवल मौके पर रेस्क्यू अभियान तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि पुलिस कार्रवाई से लेकर न्यायालय में कानूनी प्रक्रिया तक मामले को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। यही वह पहलू है जिसे जैन आचार्य ने विशेष रूप से सराहनीय माना है।
धार्मिक परंपरा और जीवदया के बीच संतुलन जरूरी: मोर पंख की पिच्छी जैन साधु-संतों की धार्मिक परंपरा से जुड़ी है और जैन धर्म का मूल सिद्धांत ही अहिंसा और जीवदया है। ऐसे में यदि किसी धार्मिक वस्तु के निर्माण या उसके व्यापार में किसी जीव को नुकसान पहुंचता है तो उस पर विचार करना स्वयं जैन दर्शन की भावना के अनुरूप है। इस विवाद का सकारात्मक पहलू यह हो सकता है कि धार्मिक परंपरा को सम्मान देते हुए यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी मोर को नुकसान पहुंचाए बिना प्राकृतिक रूप से गिरे हुए पंखों का ही इस्तेमाल हो। दूसरी ओर, यदि कहीं पंखों को नोचने, शिकार करने या अवैध रूप से बेचने का प्रमाण मिलता है तो उसके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
विवाद से निकलेगा संरक्षण का रास्ता?: मोर पंख विवाद अब केवल मेनका गांधी बनाम जैन समाज का विषय नहीं रह गया है। यह सवाल अब व्यापक रूप से सामने है कि क्या धार्मिक आस्था और वन्यजीव संरक्षण एक साथ नहीं चल सकते? जैन आचार्य सूर्यसागर महाराज की ओर से मेनका गांधी और PFA के प्रयासों की सराहना इस बहस को एक नई दिशा देती है। यदि धार्मिक समाज और पशु संरक्षण से जुड़े संगठन मिलकर यह सुनिश्चित करें कि मोर के पंखों के लिए किसी भी जीव को कष्ट न दिया जाए, तो विवाद के बजाय समाधान सामने आ सकता है। मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। उसकी रक्षा केवल कानून की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। वहीं जैन धर्म की अहिंसा की परंपरा भी यही संदेश देती है कि किसी जीव को अनावश्यक कष्ट न दिया जाए। ऐसे में मेनका गांधी के प्रयासों और आचार्य सूर्यसागर महाराज की बदली हुई दृष्टि के बीच संवाद की यह पहल एक महत्वपूर्ण संदेश दे सकती है—धर्म भी बचे और जीवदया भी।
जामा मस्जिद कार्रवाई बनी उदाहरण: हाल ही में दिल्ली के जामा मस्जिद क्षेत्र में पशु-पक्षियों के कथित अवैध व्यापार और क्रूरता के खिलाफ हुई कार्रवाई ने भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है। कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में पशु-पक्षियों को रेस्क्यू किए जाने और दुकानों के खिलाफ कार्रवाई की बात सामने आई। PFA से जुड़े सौरव गुप्ता की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा गया कि संस्था ने इस मामले में केवल मौके पर रेस्क्यू अभियान तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि पुलिस कार्रवाई से लेकर न्यायालय में कानूनी प्रक्रिया तक मामले को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। यही वह पहलू है जिसे जैन आचार्य ने विशेष रूप से सराहनीय माना है।
धार्मिक परंपरा और जीवदया के बीच संतुलन जरूरी: मोर पंख की पिच्छी जैन साधु-संतों की धार्मिक परंपरा से जुड़ी है और जैन धर्म का मूल सिद्धांत ही अहिंसा और जीवदया है। ऐसे में यदि किसी धार्मिक वस्तु के निर्माण या उसके व्यापार में किसी जीव को नुकसान पहुंचता है तो उस पर विचार करना स्वयं जैन दर्शन की भावना के अनुरूप है। इस विवाद का सकारात्मक पहलू यह हो सकता है कि धार्मिक परंपरा को सम्मान देते हुए यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी मोर को नुकसान पहुंचाए बिना प्राकृतिक रूप से गिरे हुए पंखों का ही इस्तेमाल हो। दूसरी ओर, यदि कहीं पंखों को नोचने, शिकार करने या अवैध रूप से बेचने का प्रमाण मिलता है तो उसके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
विवाद से निकलेगा संरक्षण का रास्ता?: मोर पंख विवाद अब केवल मेनका गांधी बनाम जैन समाज का विषय नहीं रह गया है। यह सवाल अब व्यापक रूप से सामने है कि क्या धार्मिक आस्था और वन्यजीव संरक्षण एक साथ नहीं चल सकते? जैन आचार्य सूर्यसागर महाराज की ओर से मेनका गांधी और PFA के प्रयासों की सराहना इस बहस को एक नई दिशा देती है। यदि धार्मिक समाज और पशु संरक्षण से जुड़े संगठन मिलकर यह सुनिश्चित करें कि मोर के पंखों के लिए किसी भी जीव को कष्ट न दिया जाए, तो विवाद के बजाय समाधान सामने आ सकता है। मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। उसकी रक्षा केवल कानून की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। वहीं जैन धर्म की अहिंसा की परंपरा भी यही संदेश देती है कि किसी जीव को अनावश्यक कष्ट न दिया जाए। ऐसे में मेनका गांधी के प्रयासों और आचार्य सूर्यसागर महाराज की बदली हुई दृष्टि के बीच संवाद की यह पहल एक महत्वपूर्ण संदेश दे सकती है—धर्म भी बचे और जीवदया भी।
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