‘सत्यार्थ प्रकाश’ ज्ञान का महाकोश : डॉ. रामचन्द्र

केंद्रीय आर्य युवक परिषद की ऑनलाइन गोष्ठी में वक्ताओं ने ग्रंथ की ज्ञान परंपरा और प्रासंगिकता पर रखे विचार

गाजियाबाद।
केंद्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में गुरुवार को ‘सत्यार्थ प्रकाश : एक विमर्श’ विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया। आयोजकों के अनुसार, कोरोना काल से शुरू हुई यह परिषद की 803वीं वेबिनार गोष्ठी थी। कार्यक्रम में वैदिक विद्वानों, आर्य समाज से जुड़े पदाधिकारियों और अन्य वक्ताओं ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के विभिन्न पक्षों पर विचार रखे। गोष्ठी के मुख्य वक्ता कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. रामचन्द्र ने कहा कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ज्ञान का महाकोश है। उनके अनुसार, भारत की सनातन ज्ञान परंपरा से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण सिद्धांतों का प्रतिपादन इस ग्रंथ में मिलता है। उन्होंने इसे वेद, उपनिषद, दर्शन, ब्राह्मण ग्रंथों और मनुस्मृति सहित भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यापक साहित्य का सार बताया।
डॉ. रामचन्द्र ने कहा कि जब महर्षि दयानंद सरस्वती देशभर में अपने प्रवचनों और शास्त्रार्थों के माध्यम से वेदों के अध्ययन एवं पुनरुद्धार का संदेश दे रहे थे, तब अनुयायियों के आग्रह पर उन्होंने अपने विचारों और सिद्धांतों को एक ग्रंथ के रूप में व्यवस्थित करने का निर्णय लिया। इसी प्रयास का परिणाम ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के रूप में सामने आया। उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद प्रारंभ में मुख्य रूप से संस्कृत में भाषण देते थे, लेकिन बाद में उन्होंने व्यापक जनसमुदाय तक अपने विचार पहुंचाने के लिए हिंदी में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना की। उनके अनुसार, ग्रंथ में भारतीय ज्ञान चेतना, दर्शन और विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक विषयों पर विस्तार से विचार किया गया है। 
शिक्षा से राजधर्म तक विभिन्न विषयों पर चर्चा: मुख्य वक्ता ने बताया कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में 14 समुल्लास (अध्याय) हैं। इनमें पूर्वार्ध में 10 और उत्तरार्ध में चार समुल्लास शामिल हैं। उन्होंने कहा कि प्रथम समुल्लास में ईश्वर के 100 नामों की व्याख्या की गई है, जबकि द्वितीय समुल्लास में शिक्षा व्यवस्था में माता, पिता और आचार्य की भूमिका पर विचार किया गया है। तृतीय समुल्लास में अध्ययन-अध्यापन की विधि तथा आर्ष पाठ विधि का उल्लेख करते हुए सभी वर्गों के बच्चों के लिए समान शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। चतुर्थ और पंचम समुल्लास में गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम से जुड़े नियमों, व्यवहार और आचरण का वर्णन किया गया है। छठे समुल्लास में वेद और मनुस्मृति के आधार पर राजधर्म से जुड़े नियमों की चर्चा है।सप्तम से दशम समुल्लास में ईश्वर, सृष्टि, उपासना, विद्या-अविद्या तथा भक्ष्य-अभक्ष्य सहित विभिन्न विषयों पर वैदिक शास्त्रों के आधार पर विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
डॉ. रामचन्द्र के अनुसार, उत्तरार्ध के चार समुल्लासों में भारत के विभिन्न मत-मतांतरों के साथ ईसाई, बौद्ध, जैन और मुस्लिम मतों से संबंधित विचारों की समीक्षा की गई है। उन्होंने बताया कि ग्रंथ के अंत में ‘स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश’ में ईश्वर, धर्म, मोक्ष, शिक्षा और यज्ञ सहित 51 महत्वपूर्ण विषयों की परिभाषाएं दी गई हैं। उन्होंने कहा कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का अध्ययन व्यक्ति को ज्ञान की ओर प्रेरित करता है और अंधविश्वास तथा भ्रम से बाहर निकलने के लिए तार्किक चिंतन का आधार प्रदान करता है।
यशोवीर आर्य ने भी रखे विचार: कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आर्य नेता यशोवीर आर्य ने भी अपने विचार व्यक्त किए। परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कार्यक्रम का संचालन किया, जबकि प्रदेश अध्यक्ष प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम के दौरान कौशल्या अरोड़ा, जनक अरोड़ा, शोभा बत्रा, संतोष धर और रविन्द्र गुप्ता, सुधीर बंसल सहित अन्य ने भजन प्रस्तुत किए। ऑनलाइन गोष्ठी में परिषद से जुड़े पदाधिकारी, कार्यकर्ता और श्रोता मौजूद रहे।

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