झूठ गढ़ने वालों की लीला तो अपरंपार है! जैसे कोई जादूगर है जो हर शाम नई ट्रिक दिखाता है। सत्य? नैतिकता? संविधान? अरे इनसे उनका क्या लेना-देना! ये लोग तो बस “सरकार ने कहा” वाला मंत्र जपते रहते हैं, चाहे बात कितनी भी बेतुकी हो।भारत का लोकतंत्र चार मंजिला इमारत है – विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया। चारों खंभे अलग-अलग खड़े, कोई किसी के गले नहीं लिपटा। पहली दो मंजिलें (विधायिका और कार्यपालिका) शासन का भार संभालती हैं – सड़क बनाओ, बिजली दो, स्कूल खोलो। बाकी दो मंजिलें (न्यायपालिका और मीडिया) ऊपर बैठकर निगरानी करती हैं कि कहीं संविधान और लोकमत की सीमा लांघ तो नहीं गई। मजेदार बात ये है कि ये चारों अक्सर आपस में लड़ते-झगड़ते नजर आते हैं, ठीक वैसी ही जैसे सास-बहू सीरियल में। एक कहता है “ये गलत है”, दूसरा कहता है “नहीं, ये सही है”। आखिरकार बैलेंस बनता है। सरकार पर न्यायपालिका में सैकड़ों मुकदमे चल रहे हैं। रोज सुनवाई, रोज सरकार अपना बचाव पेश करती है। कोई “सरकार डराती है” वाला रोना-धोना नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम काम कर रहा है। न्यायपालिका का अपना काम है, लेकिन सत्य की डगर पर चलते हुए उसे भी अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है। अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर – महान CJI साहब। जब उन्होंने कुछ अमर्यादित शब्द बोल दिए (जो शायद गुस्से में निकल गए), तुरंत बाजार गर्म हो गया। रातोंरात एक नई सोशल मीडिया पार्टी जन्म ले ली। जैसे कोई जादू की छड़ी घुमाई और “अरे भाई, सरकार ने CJI को मजबूर किया!” वाला नैरेटिव तैयार। विदेशी फंडिंग के पाइपलाइन खुल गए। देश-विदेश के भारत-विरोधी, विकास-विरोधी, हर तरह के “विरोधी” एक मंच पर इकट्ठा। कई सोशल मीडिया ग्रुप बन गए “CJI को बचाओ, सरकार को गाली दो”। यहाँ मजा ये है कि ये लोग एक छोटा सा तथ्य भूल जाते हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में सरकार की कोई भूमिका नहीं होती! CJI बनने का फॉर्मूला बेहद सरल है – सुप्रीम कोर्ट का सबसे सीनियर जज। कोई सिफारिश, कोई इंटरव्यू, कोई राजनीतिक दबाव नहीं। बस लिस्ट निकालो। कोई बच्चा भी सुप्रीम कोर्ट की जजेस की लिस्ट देखकर बता सकता है कि अगले दस साल में कौन-कौन CJI बनेगा। नाम पहले से तय हैं, जैसे ट्रेन का टाइम टेबल! फिर ये शोर कैसा? ये षड्यंत्र कैसा? दोस्तों, बिना किसी बहकावे के घटनाओं का आनंद लीजिए। सारा नाटक तो आरोपी खुद रच रहे हैं। वे खुद अपनी गली में आग लगाकर चीख रहे हैं कि “पड़ोसी ने लगाई!”। हमें उनके लिए कॉकरोच बनने की कोई जरूरत नहीं। कॉकरोच तो वो हैं जो हर रोशनी में भागते फिरते हैं। हम तो बस तथ्यों की रोशनी में बैठकर पॉपकॉर्न खाते हुए ये मजेदार सर्कस देखें।
भारत का लोकतंत्र इतना मजबूत है कि चार खंभे अलग-अलग खड़े रहकर भी इमारत को संभाल लेते हैं। झूठ बोलने वाले अपना खेल खेलते रहें, लेकिन सच ये है – CJI साहब अपनी मर्जी से बोलते हैं, अपनी मर्जी से फैसला करते हैं, और सरकार का इसमें कोई रोल नहीं।
जीवन में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि हम क्या खाते-पीते हैं या कितना पैसा कमाते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हम अपने बच्चों को किस तरह का इंसान बना रहे हैं। कल्पना कीजिए एक कॉकरोच की। रोशनी पड़ते ही वह भागता है। अंधेरे और गंदगी में उसे आराम मिलता है। गटर, कचरा, सड़ांध — यही उसका संसार है। वह सत्य की रोशनी से डरता है, क्योंकि रोशनी उसे बेनकाब कर देती है। झूठ, अफवाह, नफरत, षड्यंत्र — ये सब उसके लिए भोजन हैं। अब सोचिए — क्या हम अपने बच्चों को यही बनाना चाहते हैं? ऐसे कॉकरोच जो:सत्य सामने आने पर भाग खड़े हों
गंदी सोशल मीडिया पोस्ट्स, फेक न्यूज और नकारात्मकता में खुशी महसूस करें
हमेशा दूसरे को दोष दें, कभी खुद को नहीं
रोशनी (ज्ञान, सत्य, नैतिकता) से दूर भागें
नहीं! बिल्कुल नहीं।हमें उन्हें जुगनू बनाना चाहिए, जुगनू अंधेरे में चमकता है। जब चारों तरफ घुप्प अंधेरा होता है, तभी उसकी रोशनी सबसे ज्यादा मायने रखती है। जुगनू बनने वाले बच्चे:मुश्किल समय में भी सत्य की छोटी-सी रोशनी जलाए रखते हैं
झूठ और गंदगी के बीच भी अपनी चमक खोते नहीं
अकेले होने पर भी हार नहीं मानते, बल्कि खुद को प्रकाशित करते हैं
दूसरों को रास्ता दिखाते हैं, न कि अंधेरे में घसीटते हैं
या फिर हमें उन्हें भौंरा बनाना चाहिए, भौंरा गंदगी पर नहीं ठहरता। वह सुगंधित फूलों की तलाश में रहता है। जहां सुंदरता है, जहां मधुरता है, जहां ज्ञान और सद्गुण हैं — वहीं वह जाता है।भौंरा बनने वाले बच्चे:अच्छी किताबें, सकारात्मक विचार और सच्चे लोगों की संगति चुनते हैं
नकारात्मकता और गंदगी को नजरअंदाज कर सकारात्मकता की ओर उड़ते हैं
मेहनत से ज्ञान का शहद इकट्ठा करते हैं
फूलों (समाज, संस्कृति, नैतिकता) का सम्मान करते हैं और उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाते
जुगनू या भौंरा बनाने के लिए बच्चों को सत्य की आदत डालें — उन्हें बताएं कि झूठ बोलना सबसे बड़ा कॉकरोच-गुण है। छोटी-छोटी बातों में भी सच्चाई सिखाएं।
रोशनी से डरना बंद करें — सवाल पूछने दो। आलोचना सुनने की क्षमता विकसित करें। गलती मानने का साहस दें।
संगति चुनना सिखाएं — उन्हें सिखाएं कि कौन-सी खबर, कौन-सा सोशल मीडिया, कौन-सा दोस्त उन्हें भौंरा बनाएगा और कौन कॉकरोच।
अंधेरे में चमकना सिखाएं — जब सब गलत कर रहे हों, तब सही खड़े रहने की ताकत दें।
सुंदरता की तलाश — उन्हें कला, ज्ञान, सेवा, संस्कृति और अच्छाई की ओर आकर्षित करें।
अंत में एक बात हमेशा याद रखें:
जो बच्चा रोशनी से भागता है, वह कभी सूरज नहीं बन सकता।
जो गंदगी में रमा रहता है, वह कभी फूल नहीं बन सकता।
हमारे बच्चे कॉकरोच बनकर गटर की जिंदगी जीने के लिए नहीं बने हैं। वे जुगनू बनकर अंधेरे को रोशन करने के लिए और भौंरा बनकर सुंदरता को अपनाने के लिए आए हैं।इसे अपना मिशन बनाइए।
घर में, स्कूल में, बातचीत में — हर जगह यही संदेश दें।क्योंकि कल का भारत उन्हीं बच्चों पर निर्भर करेगा जो आज आप अपने बच्चों को बनाना चाहते हैं?
जुगनू? भौंरा? या फिर... कॉकरोच? चुनाव आपका है। लेकिन याद रखिए — यह चुनाव बहुत बड़ा है।
Tags
विविध